खरी-अखरी | भाजपा का पतन शुरू, शिवराज का जादू खत्म, कहीं कांग्रेस साफ तो कहीं भाजपा मटियामेट, प्रदेश में “आप” की धमाकेदार एंट्री !

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सांकेतिक चित्र।

*    समाचार प्रकाशित करने में अखबारों ने बिकाऊपने का इजहार किया

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      अश्वनी बड़गैयाँ ( वरिष्ठ अधिवक्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार) सम्पर्क- 9131776975

मध्यप्रदेश में हुए नगरीय निकायों के लिए 6 जुलाई को हुए प्रथम चरण के मतदान की मतगणना के परिणाम 17 जुलाई को घोषित किए जा चुके हैं। 13 जुलाई को हुए मतदान की मतगणना 20 जुलाई को होगी। पहले मतगणना 18 जुलाई को होनी थी परंतु इस दिन होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के कारण तिथि में बदलाव किया गया है। प्रथम चरण में 11 नगर निगमों में महापौर की कुर्सी दांव पर लगी हुई थी। घोषित परिणाम भाजपा को आईना दिखाने के लिए पर्याप्त हैं। 11 नगर निगमों में से भाजपा 7 नगर निगमों में ही जीत दर्ज करा पाई है जबकि पूर्व में भाजपा के पास 11 की 11 नगर निगमें थीं। प्रदेश में 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं।
57 साल ग्वालियर में और 18 साल जबलपुर में अकंटक नगर सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी दोनों जगह अपनी सत्ता खो बैठी। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच में बसे सिंगरौली नगर निगम की महापौरी कुर्सी हथिया कर आम आदमी पार्टी (आप) ने मध्य प्रदेश में धमाकेदार एंट्री करते हुए न केवल इतिहास रच दिया है बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की पेशानी में बल डाल दिया है। तीसरे विकल्प को तलाश रही जनता को आशा की किरण सी मिलती दिख रही है।
इसके बावजूद भाजपाईयों का इस बात पर इतराना कि शिवराज की कुशल रणनीति और हाड़तोड मेहनत के बूते भारतीय जनता पार्टी ने नगरीय निकाय चुनाव में में मेयर की दस कुर्सियों में से सात कुर्सियां कब्जा ली हैं, मूर्खतापूर्ण ही कहा जाएगा। भाजपाई इस बात पर भी नागिन डांस कर रहे हैं कि कई स्थानों पर कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है मगर उनकी मोतियाबिंदी आंखों से वह दिखाई नहीं देता कि अनेक स्थानों पर भाजपा मटियामेट हो चुकी है।
कटनी जिले के दो नगरीय निकाय कैमोर और विजयराघवगढ़ के परिणाम आने पर कतिपय कार्यकर्ता चाटुकारिता के शिखर पर खड़े होकर स्थानीय विधायक का खोखला महिमामंडन कर रहे हैं। यह कैसी कुशल रणनीति है कि कैमोर और विजयराघवगढ़ दोनों जगह भाजपा को अपनी सीटें खोनी पड़ी हैं।
मसलन विजयराघवगढ़ में पूर्व में भाजपा के पास 14 पार्षद थे कांग्रेस के पास एक पार्षद था जबकि नई परिषद में भाजपा के पास 7 पार्षद ही हैं वहीं जहां कांग्रेस के पास एक पार्षद था अब 4 पार्षद हो गए हैं साथ ही 3 निर्दलीय और एक आम आदमी पार्टी (आप) का पार्षद है। इसी तरह कैमोर की पूर्व परिषद में भाजपा के पार्षदों की संख्या 12 तथा कांग्रेस 2 और निर्दलीय 1 पार्षद थी जबकि अब भाजपा के पार्षद घट कर 11 रह गये हैं वहीं निर्दलीय की गिनती एक से बढ़कर चार हो गई है।
विजयराघवगढ़ में पार्षदों की संख्या 14 से घट कर आधी (7) रह जाना, कैमोर में भी एक पार्षद कम हो जाने पर भी क्षेत्रीय विधायक की कुशल रणनीति तो तभी कही जा सकती है जब पार्टी जनों को उस विधायक पर जिसने मय परिवार दो दशक से क्षेत्र में कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों को प्रायवेट एंड कंपनी बना समझ कर विधायकी की हो उस पर इतनी भी सीटें मिलने का विश्वास नहीं था जितनी सीटें मिल गईं तब तो जीत का जश्न मनाना बनता है वर्ना फिर तो………! जहां विजयराघवगढ़ में कांग्रेस ने मेहनत कर भाजपा को घुटनाटेक होने पर विवश कर दिया है तो वहीं कैमोर में कांग्रेस खुद लम्बलेट हो गई है।
एक बात और जिला पंचायत के अन्तर्गत आने वाले दो वार्ड 13 एवं 14 जो लगभग पूरी विजयराघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र को कवर करते हैं वहां से सामान्य वर्ग के स्थान पर पिछड़ा वर्ग के लोगों का जीतना क्षेत्र में एक नई राजनीतिक समीकरण को जन्म देने के लिए पर्याप्त है। जो वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में सामान्य वर्ग से आने वाले वर्तमान विधायक के सामने चुनौती पेश कर सकता है।
मध्यप्रदेश में दो दलीय व्यवस्था होने से जनता के सामने सांपनाथ और नागनाथ में से किसी एक को चुनना मजबूरी थी। बहुत समय से प्रदेशवासी किसी तीसरे विकल्प (नेवलानाथ) को तलाश रहे थे। सिंगरौली में बनने वाली आम आदमी पार्टी (आप) की नगर सरकार आगामी चुनावों में तीसरे विकल्प की संभावना को मजबूती प्रदान कर सकती है। प्रदेश के कई नगरीय निकायों में भी आम आदमी पार्टी (आप) ने बतौर पार्षद अपनी आहट दर्ज करा दी है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।
जबलपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कद्दावर स्वयंसेवक डॉ. जितेन्द्र जामदार की पराजय को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। डॉ. जामदार की हार भाजपा से कहीं ज्यादा आरएसएस की हार है। जिसने न केवल जबलपुर को बल्कि पूरे महाकौशल को झकझोर कर रख दिया है और इससे सारे महाकौशल की राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है। कमोबेश यही हाल 57 साल तक ग्वालियर में नगर सरकार बनाकर चलाने वाली भाजपा के हैं जिसने भाजपा के कद्दावर नेताओं को सदमे में ला दिया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के आंचलिक क्षेत्र में भी कई निकायों में हैं जहां भाजपा लगभग मटियामेट सी हो गई है।
अश्वनी बड़गैयाँ ।

*डिस्क्लेमर– इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Radar news उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार Radar news के नहीं हैं तथा रडार न्यूज़ उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।